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विटामिन (Vitamin) - प्रकार उपयोग संपूर्ण जानकारी!

विटामिन क्या है -

परिचय-

शरीर को स्वास्थ्य प्रदान करने के लिए विटामिनों के महत्वपूर्ण योगदान से इन्कार नहीं किया जा सकता है। शरीर के समुचित पोषण के लिए विटामिन अति आवश्यक सहायक तत्व हैं। आधुनिक काल में विटामिनों की खोज के बाद इनका प्रचलन तेजी से जोर पकड़ चुका है। सभी विटामिन जो अब तक चिकित्सा विज्ञानियों ने खोज निकाले हैं वे सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। ये हमारे भोजन में काफी कम मात्रा में होकर भी हमारे शरीर को नई जीवन शक्ति देते हैं। इनकी कमी से शरीर रोगग्रस्त हो जाता है। जब विटामिनों की किसी कारणवश शरीर में पूर्ति हो पाना सम्भव नहीं होता तब यह कमी मृत्यु का कारण बन जाती है।

विटामिन ऐसे आवश्यक कार्बनिक पदार्थ हैं, जिनकी अल्प मात्राएं सामान्य चयापचय और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। ये विटामिन शरीर में स्वत: पैदा नहीं हो सकते, इसलिए इन्हें भोजन से प्राप्त किया जाता है। इनका कृत्रिम रूप से भी उत्पादन किया जाता है।

समुचित मात्रा में विटामिन प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को ताजा भोजन ही करना चाहिए। भोजन पकाने में असावधानी बरतने, सब्जियों को काफी देर तक उबालने, इन्हें तेज रोशनी में रखने आदि से इन वस्तुओं में मौजूद विटामिन नष्ट हो जाते हैं। विटामिनों को दो वर्गो में विभजित किया गया है- वसा विलेय (soluble) और जल विलेय

वसा विलेय विटामिन-

विटामिन `ए´ (रेटिनोल), डी, ई (टेकोफेरोल) और विटामिन बी-1 (थायामिन), बी-2 (राइबोफ्लेविन), नियासीन (निकोटिनिक अम्ल), पेण्टोथेनिक अम्ल, बायोटिन, विटामिन बी-12 (साइनोकैबैलेमाइन), फोलिक अम्ल और विटामिन सी (ऐस्कॉर्बिक अम्ल) जल में विलेय विटामिन है।

कुछ आवश्यक विटामिन

विटामिन

श्रेष्ठ स्रोत

भूमिका

आर.ड़ी.ए.

विटामिन-ए

दूध, मक्खन, गहरे हरे रंग की सब्जियां शरीर पीले और हरे रंग के फल व सब्जियों में मौजूद पिग्मैंट कैरोटीन को भी विटामिन  में बदल देता है

यह ऑख के रेटिना, सरीखी शरीर की झिल्लियों, फेफड़ों के अस्तर और पाचक-तंत्र प्रणाली के लिए आवश्यक है

1 ग्राम.

थायमिन-बी1

साबुत अनाज, आटा दालें, मेवा, मटर और फलियां

यह कार्बोहाइड्रेट के ज्वलन को सुनिश्चित करता है।

1.0-1.4 मि.ग्राम

राइबोफ्लैविन-बी2

दूध, पनीर

यह ऊर्जा रिलीज और रख-रखाव के लिए सभी कोशिकाओं के लिए आवश्यक है।

1.2-1.4 मि.ग्राम

नियासीन

साबुत अनाज, आटा और एनरिच्ड अन्न

यह ऊर्जा रिलीज और रख-रखाव के लिए सभी कोशिकाओं के लिए आवश्यक होती है

13-19 मि.ग्राम

पिरीडॉक्सिन- बी6

साबुत अनाज, दूध

रक्त कोशिकाओं और तंत्रिकाओं को समुचित रूप से काम करने के लिए इसकी जरूरत होती है।

लगभग 2 मि.ग्रा

पेण्टोथेनिक अम्ल

गिरीदार फल और साबुत अनाज

ऊर्जा पैदा करने के लिए सभी कोशिकाओं को इसकी जरूरत पड़ती है।

4-7 मि.ग्रा

बायोटिन

गिरीदार फल और ताजा सब्जियां

त्वचा और परिसंचरण-तंत्र के लिए आवश्यक है

100-200 मि.ग्रा

विटामिन-बी12

दुग्धशाला उत्पाद

लाल रक्त कोशिकाओं, अस्थि मज्जा-उत्पादन का साथ-साथ तंत्रिका-तंत्र के लिए आवश्यक है।

3 मि. ग्रा

फोलिक अम्ल

ताजी सब्जियां

लाल कोशिकाओं के उत्पादन के लिए आवश्यक है।

400 मि.ग्रा

विटामिन- सी

सभी रसदार फल, टमाटर कच्ची बंदगोभी, आलू, स्ट्रॉबेरी

हड्डियों, दांत और ऊतकों के रख-रखाव के लिए आवश्यक है।

60 मि.ग्रा

विटामिन-डी

दुग्धशाला उत्पाद, बदन में धूप सेकने से कुछ एक विटामिन त्वचा में भी पैदा हो सकते है।

रक्त में कैल्सियम का स्तर बनाए रखने और हड्डियों के संवर्द्दन के लिए आवश्यक है

5-10 मि.ग्रा

विटामिन-ई

वनस्पति तेल और अनेक दूसरे खाद्य-पदार्थ

वसीय तत्वों से निपटने वाले ऊतकों तथा कोशिका झिल्ली की रचना के लिए जरूरी है।

8-10 मि.ग्रा


विटामिंस के प्रकार-

विटामिन 'ई'

विटामिन ई एक एंटीऑक्सीडेंट है और लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन में मदद करता है. विटामिन ई से समृद्ध होती हैं कि खाद्य पदार्थ शामिल हैं:
  • एवोकैडो
  • टमाटर
  • Watercress
  • ब्रसेल्स स्प्राउट्स
  • पालक
  • जामुन
  • सामन
  • साबुत अनाज उत्पाद
  • पागल
  • जैतून का तेल
  • सूरजमुखी तेल
  • प्रकार की समुद्री मछली
  विटामिन `ई´ की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग-

विटामिन `युक्त खाद्यों की तालिका-

विटामिन `´ की महत्वपूर्ण बातें-

  • विटामिन `ई´ वसा में घुलनशील होता है।
  • अंकुरित अनाज तथा शाक-भाजियों में यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
  • अंतरिक्ष यात्रियों में ऑक्सीजन की अधिकता से रक्तहीनता का दोष पैदा हो जाता है जो विटामिन `ई´ से ठीक हो जाता है।
  • विटामिन `ई´ में किसी भी प्रकार की वेदना को दूर करने का विशेष गुण रहता है।
  • शरीर में विटामिन `ई´ की कमी हो जाने से किसी भी रोग का संक्रमण जल्दी लग जाता है।
  • विटामिन `ई´ की कमी होते ही क्रमश: विटामिन `ए´ भी शरीर से नष्ट होने लगता है।
  • गेहूं के तेल में विटामिन `ई´ भरपूर रहता है।
  • सलाद, अण्डे तथा मांस आदि में विटामिन `ई´ बहुत ही कम मात्रा में पाया जाता है।
  • स्त्रियों का बांझपन शरीर में विटामिन `ई´ की कमी के कारण होता है।
  • विटामिन `ई´ को टेकोफेरोल भी कहा जाता है।
  • विटामिन `ई´ का महिलाओं के बांझपन, बार-बार गर्भ गिर जाने, बच्चा मरा हुआ पैदा होने जैसे रोगों को रोकने के लिए सफलतापूर्वक पूरे संसार में प्रयोग किया जा रहा है।
  • आग से जल जाने वाले रोगी के लिए विटामिन `ई´ ईश्वरीय वरदान कहा जाता है इसके प्रयोग से जले हुए रोगी को संक्रमण भी नहीं लगता है।
  • प्रजनन अंगों पर विटामिन `ई´ विशेष रूप से प्रभाव पैदा करता है।
  • विटामिन `ई´ पर ताप का कोई प्रभाव पैदा नहीं होता है।
  • पुरुषों की नपुंसकता का एक कारण शरीर में विटामिन ई की कमी हो जाना भी होता है।
  • बिनौले में पर्याप्त विटामिन `ई´ मौजूद रहता है।
  • शिराओं के भंयकर घाव, गैंग्रीन आदि विटामिन `ई´ के प्रयोग से समाप्त हो जाते हैं।
  • शरीर में विटामिन `ई´ पर्याप्त रहने पर विटामिन `ए´ की शरीर को कम आवश्यकता पड़ती है।
  • हार्मोंस संतुलन के लिए विटामिन `ई´ का महत्वपूर्ण योगदान है।
  • विटामिन `ई´ की कमी से थायराइड ग्लैण्ड तथा पिट्यूटरी ग्लैण्ड की क्रियाओं में बाधा उत्पन्न हो जाती है।
  • विटामिन `ई´ की कमी से स्त्री के स्तन सिकुड़ जाते हैं और छाती सपाट हो जाती है।
  • मानसिक रोगों से ग्रस्त रोगियों को विटामिन `ई´ प्रयोग कराने से लाभ होता है।
  • स्त्रियों में कामश्वासना लोप हो जाने पर विटामिन `ई´ का प्रयोग कराने से लाभ होता है।

                   विटामिन 'ए'

विटामिन ए की हड्डी विकास, दृष्टि और कोशिका विभाजन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह अच्छी दृष्टि को बढ़ावा देता है और स्वस्थ हड्डियों, दांत, त्वचा, और कोमल ऊतकों को बनाए रखने में मदद करता है. विटामिन ए के सूत्रों का कहना पौधे और पशु स्रोतों दोनों शामिल हैं.

पशु सूत्रों निम्नलिखित शामिल हैं:

  • गोमांस
  • अंडे
  • चिकन
  • मछली
  • सीफ़ूड

फलों और सब्जियों अच्छा संयंत्र स्रोत हैं. विटामिन ए में उच्च रहे हैं कि फल में शामिल हैं:

  • सेब
  • खुबानी
  • संतरे
  • आम
  • Cantaloupe
  • तरबूज
  • न्यूजीलैंड
  • आलूबुख़ारे
  • आड़ू
  • Blackberries

विटामिन ए में उच्च रहे हैं कि सब्जियों में से कुछ हैं

  • साग
  • गाजर
  • पालक
  • Collards
  • कद्दू
  • मटर
  • ब्रोक्कोली
  • टमाटर
  • शलजम
  • Escarole
  • गेहूं के बीज

जैसे पनीर, दूध, दही और जैसे डेयरी उत्पादों को भी विटामिन ए का अच्छा प्राकृतिक स्रोत हैं

विटामिन `ए´ की कमी से होने वाले रोग-

  • फेफड़े व सांस की नली के रोग।
  • सर्दी-जुकाम
  • नाक-कान के रोग।
  • हड्डी व दांतों का कमजोर हो जाना।
  • त्वचा का खुरदरा होना, पपड़ी उतरना।
  • चर्म रोग, फोड़े-फुंसी, कील-मुंहासे, दाद, खाज।
  • जांघ व कमर के ऊपरी भाग पर बालों के स्थान मोटे हो जाना।
  • आंखों का तेज प्रकाश सहन न कर पाना, शाम व रात को कम दिखाई देना या अंधा हो जाना।
  • गुर्दे या मूत्राशय में पथरी बन जाना।
  • शरीर का वजन घट जाना।
  • नाखून आसानी से टूट जाना।
  • कब्ज होना
  • स्त्री-पुरुष की जननेद्रियां कमजोर पड़ जाना।
  • तपेदिक (टी.बी.)
  • संग्रहणी, जलोदर।

विटामिन-ए से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें-

  • विटामिन-`ए´ का आविष्कार 1931 में हुआ था।
  • विटामिन-`ए´ जल में घुलनशील है।
  • विटामिन-`ए´ तेल और वसा में घुल जाता है।
  • विटामिन-`ए´ ‘शरीर को रोग प्रतिरोधक क्षमता देता है।
  • नन्हें बच्चों को विटामिन `ए´ की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
  • गर्भावस्था में स्त्री को विटामिन `ए´ की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
  • शरीर में संक्रामक रोगों के हो जाने पर विटामिन `ए´ की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
  • विटामिन `ए´ की कमी से बहरापन होता है।
  • सर्दी, खांसी, जुकाम, नजला जैसे रोग विटामिन `ए´ की कमी से होते हैं।
  • फेफड़ों के संक्रमण विटामन `ए´ की कमी से होते हैं।
  • विटामिन `ए´ की कमी से रोगी तेज प्रकाश सहन नहीं कर पाता है।
  • विटामिन `ए´ की कमी से कील-मुंहासे आदि कई चर्मरोग हो जाते हैं।
  • विटामिन `ए´ की कमी से आंखों में आंसू सूख जाते हैं।
  • विटामिन `ए´ की कमी से नाखून आसानी से टूटने लगते हैं।
  • विटामिन `ए´ की कमी से आंखों का रतौंधी रोग हो जाता है।
  • विटामिन `ए´ की कमी से अनेक आंखों के रोग आ घेरते हैं।
  • विटामिन `ए´ की कमी से दांत कमजोर हो जाते हैं और दांतों का एनामेल बनने में रुकावट हो जाती है।
  • दांतों में गड्ढे विटामिन `ए´ की कमी से होते हैं।
  • विटामिन `ए´ की कमी से पुरुष के जननांगों पर प्रभाव पड़ता है।
  • साइनस, नथुने, नाक, कान और गले, शिराओं, पतली रक्त वाहिनियों, माथे की रक्त वाहिनियों के संक्रमण विटामिन `ए´ की पूर्ति करने से दूर हो जाते हैं।
  • स्कारलेट फीवर विटामिन `ए´ देने से ठीक हो जाता है।
  • विटामिन `ए´ को संक्रमण विरोधी विटामिन की संज्ञा दी जाती है।
  • विटामिन `ए´ की कमी से बच्चों की बढ़त थम जाती है।
  • बच्चों को एक हजार से लेकर तीन हजार यूनिट आई, प्रतिदिन विटामिन `ए´ की आवश्यकता होती है।
  • विटामिन `ए´ की कमी दिमाग की 8वीं नाड़ी पर बुरा प्रभाव डालती है।
  • विटामिन `ए´ के प्रयोग से गुर्दों की पथरी का डर नहीं रहता। पथरी रेत के कण जैसी बनकर मूत्र से निकल जाती है।
  • गिल्हड़ (घेंघा) रोग विटामिन `ए´ की कमी से होता है।
  • दिल धड़कने वाले रोगी को विटामिन-ए´ के साथ विटामिन-बी1 भी देना चाहिए।
  • विटामिन-`ए´ की कमी से स्त्री के जननांगों पर घातक प्रभाव पड़ता है।
  • विटामिन-`ए´ की कमी से स्त्री का डिम्बाशय सिकुड़ जाता है।
  • विटामिन-`ए´ की कमी से पुरुष के अण्डकोष सिकुड़ जाते हैं।
  • विटामिन-`ए´ और `ई´ शरीर में घट जाने पर स्त्री और पुरुषों की संभोग करने की इच्छा नहीं रहती तथा सन्तान उत्पन्न करने की क्षमता भी समाप्त हो जाती है।
  • विटामिन-`ए´ और `ई´ की कमी से पिट्यूटरी ग्लैण्ड की सक्रियता में बाधा हो जाती है।
  • विटामिन-`ए´ से धमनियां और शिराएं मुलायम रहती हैं।
  • विटामिन-`ए´ की कमी से बाल झड़ने लगते हैं।
  • मछली के तेल में विटामिन-`ए´ सबसे अधिक होता है।
  • विटामिन-`ए´ की कमी से सिर के बाल खुरदरे हो जाते हैं।
  • विटामिन-`ए´ की कमी से भूख घट जाती है।
  • विटामिन-`ए´ की कमी से मौसमी एलर्जी होती है।
  • विटामिन-`ए´ की कमी से वजन गिर जाता है।

विटामिन `´ युक्त खाद्य

(प्रति 100 ग्राम)

क्र.स.

खाद्य

यूनिट

1.

हरा धनिया

10000 अ.ई.

2.

पालक

5500 अ.ई.

3.

पत्तागोभी

2000 अ.ई.

4.

ताजा पोदीना

2500 अ.ई.

5.

हरी मेथी

4000 अ.ई.

6.

मूली के पत्ते

6500 अ.ई.

7.

पका पपीता

2000 अ.ई.

8.

टमाटर

300 अ.ई.

9.

गाजर

3000 अ.ई.

10.

पका आम

45000 अ.ई.

11.

काशीफल (सीताफल)

1000 अ.ई.

12.

हालीबुट लीवर ऑयल (मात्रा एक चम्मच)

60000 अ.ई.

13.

शार्क लीवर ऑयल (मात्रा एक चम्मच)

6000 अ.ई.

14.

बकरी की कलेजी

22000 अ.ई.

15.

दूध

200 अ.ई.

16.

अण्डा

2000 अ.ई.

17.

मक्खन

2500 अ.ई.

18.

घी

2000 अ.ई.

19.

भेड़ की कलेजी

22000 अ.ई.

निम्नलिखित खाद्य-पदार्थों में विटामिन-`ए´ अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है। जिस रोगी को विटामिन-`ए´ की कमी हो जाए उसे नीचे लिखी तालिका से चुनकर खाद्य-पदार्थ प्रयोग कराना अतिशय गुणकारी होता है-

                       विटामिन 'एच'

विटामिन एच को बायोटिन भी कहा जाता है। यह भी विटामिन बी-काम्लेक्स परिवार का ही एक सदस्य है। इसकी कमी से शरीर में रक्ताल्पता (खून की कमी), और रक्त में लाल कणों का अभाव पैदा हो जाता है। त्वचा पर इसका प्रभाव दिखाई देने लगता है। इसके न रहने पर त्वचा पीली या सफेद सी नजर आने लगती है। इसके न रहने पर सीरम कोलेस्ट्रोल की वृद्धि हो जाती है। विटामिन एच के प्रयोग से जल्दी ही इसकी कमी से होने वाले समस्त विकारों से छुटकारा मिल जाता है। शरीर में रक्ताल्पता (खून की कमी) तो मात्र 6-8 दिन के प्रयोग से ही समाप्त होती देखी गई है। रक्ताल्पता (खून की कमी) दूर होते ही त्वचा पर उभरी सफेदी अथवा पीलापन खुद ही दूर हो जाता है और रोगी अपने अन्दर नई ताजगी स्फूर्ति अनुभव करने लगता है। सीरम कोलेस्ट्रॉल की वृद्धि भी इसके कुछ दिनों के प्रयोग से संतुलित हो जाती है। अत: विटामिन बी-काम्पलेक्स का यह सदस्य अन्य विटामिनों की भांति महत्व ही नहीं रखता बल्कि जीवन शक्ति भी देता है।

एडेनिलिक एसिड-

एडेनिलिक एसिड भी विटामिन बी-काम्पलेक्स परिवार का विशेष सदस्य है। यह यीस्ट में पाया जाता है। पेलाग्रा रोग तथा श्लेष्मकला के जख्म आदि में इसका प्रयोग करने से अतिशय गुणकारी प्रभाव पैदा होता है। इसके प्रभाव से विष लक्षण होना भी संभावित है अत: इसका प्रयोग पूर्ण सावधानी और सतर्कता से करना चाहिए।

कोलीन-coline

कोलीन भी विटामिन बी-काम्पलेक्स परिवार का सदस्य है। यकृत रोगों पर इसका प्रभाव होता है विशेष करके जब यकृत में चर्बी जमा हो जाती है। शरीर में इसकी उपस्थिति से यकृत सम्बंधी रोगों पर रोक लग जाती है अर्थात् यकृत विकार नहीं हो पाते हैं।

फोलिक एसिड-

फोलिक एसिड विटामिन बी-काम्पलेक्स का ही एक शक्तिशाली सदस्य है जो मैक्रोसाइटिक एनीमिया में सफलतापूर्वक प्रयोग की जा रही है। यह पशुओं के यकृत, सोयाबीन, हरी साग, सब्जियां, सूखे मटर, दालेंपालक, चौलाई आदि में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। फोलिक एसिड को आयरन के साथ देने से अधिक शक्तिशाली प्रभाव पैदा होता है। यह कृत्रिम विधियों से बनाया जाता है। प्रारंभ में इसको पालक की हरी पत्तियों में पाया गया था। पालक इसका प्रमुख स्रोत है। इसकी टिकिया तथा इंजेक्शन दोनों उपलब्ध हैं। संग्रहणी, स्प्रू, पुराने दस्तों के बाद होने वाली खतरनाक रक्ताल्पता (खून की कमी) के लिए फोलिक एसिड का प्रयोग रामबाण सिद्ध होता है। गर्भावस्था में होने वाली खून की कमी के लिए इसका प्रयोग करना लाभकारी रहता है। वैसे गर्भावस्था में फोलिक एसिड प्रारंभ से ही देना शुरू कर देना चाहिए। इसको अकेले, आयरन के साथ अथवा लीवर एक्सट्रैक्ट के साथ देना चाहिए। इन दोनों के साथ यह और भी अधिक शक्ति संपन्न हो जाता है। फोलिक एसिड नारंगी रंग का दानेदार फीका पाउडर होता है। स्वस्थ शरीर में इसकी सामान्य मात्रा 5 से 20 मिलीग्राम तथा रोगावस्था में 100 से 150 मिलीग्राम तक होती है।

                         विटामिन 'एफ'

विटामिन `एफ´ सामान्यत: तेल युक्त बीजों में पाया जाता है।
  • विटामिन `एफ´ घी, तेल और चर्बी में नहीं पाया जाता है।
  • विटामिन `एफ´ की कमी हो जाने से प्रोस्टेट-ग्लैण्ड की शोथ (सूजन) हो जाती है।
  • यदि शरीर में विटामिन `एफ´ की कमी हो जाए तो शरीर में स्थित अन्य विटामिन विशेष करके विटामिन `ए´, `डी´, `ई´ और `के´ शरीर का अंश नहीं बन पाते हैं।
  • भारत में अभी तक विटामिन `एफ´ का प्रचलन नहीं है जबकि इसकी खोज हुए वर्षों हो चुके हैं। विदेशों में यह प्रयोग हो रहा है, विशेषकर अमरीका में अत्यधिक प्रचलन में है।
  • विटामिन `एफ´ हाई ब्लडप्रेशर का रोग कम करता है।
  • विटामिन `एफ´ बुढ़ापे के रोगों के लिए रामबाण साबित होता है।
  • विटामिन `एफ´ के प्रयोग से आयु बढ़ती है।
  • यह सूरजमुखी के फूलों के बीजों में अधिक मात्रा में पाया जाता है।
  • क्षय रोग के लिए कद्दू और उसके बीज अति लाभदायक होते हैं, क्योंकि उनमें विटामिन `एफ´ काफी मात्रा में पाया जाता है।
  • विटामिन `एफ´ की शरीर में कमी हो जाने पर बाल खुश्क, खुरदरे तथा निर्जीव से हो जाते हैं।
  • विटामिन `एफ´ की कमी से पित्ताशय में रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
  • विटामिन `एफ´ की कमी से मूत्र रुक जाता है क्योंकि प्रोस्टेट ग्लैण्ड की सूजन उत्पन्न हो जाती है।
  • अगर त्वचा की पपड़ियां उतर रही हों तो तुरन्त समझना चाहिए कि शरीर में विटामिन `एफ´ की कमी हो चुकी है।
  • विटामिन `एफ´ के प्रयोग से बुढ़ापे में प्रोस्टेट-ग्लैण्ड का रोग हो जाता है और रोगी की संभोग शक्ति बढ़ जाती है।
  • बुढ़ापे में विटामिन `एफ´ के प्रयोग से रक्तवाहिनियों की कठोरता समाप्त हो जाती है और रक्तवाहिनियां नरम-मुलायम हो जाती हैं।
  • विटामिन `एफ´ रक्त में कोलोस्ट्रॉल की मात्रा को कम करता है।
  • कद्दू के बीजों की गिरी में विटामिन `एफ´ काफी मात्रा में विद्यमान होता है।
  • आयुर्वेदिक चिकित्सक हजारों वर्षा से कद्दू के बीजों का चिकित्सा में प्रयोग करते आ रहे है, जाहिर है वे कद्दू के बीजों की मींगी में स्थित क्षय रोग (टी.बी.) को दूर करने वाली शक्ति से परिचित रहे होंगे-जबकि चिकित्सा विज्ञान ने आज खोज निकाला है कि कद्दू की मींगी में क्षय रोग को समाप्त करने के लिए विटामिन `एफ´ होता है।
  • विटामिन `एफ´ के प्रयोग से हृदय शक्तिशाली हो जाता है और हृदय के कई विकार शान्त हो जाते हैं।
  • एक्जिमा रोग का कारण शरीर में विटामिन `एफ´ की कमी हो जाना भी होता है।
  • राक्षसी भूख का एक कारण शरीर में विटामिन `एफ´ की कमी भी होती है।
  • गुर्दों के रोग विटामिन `एफ´ की कमी के कारण होते हैं।
  • विटामिन `एफ´ के प्रयोग से सिर के बाल सुन्दर और चमकीले हो जाते हैं।
  • विटामिन `एफ´ के प्रयोग से शरीर में चुस्ती-फुर्ती और रक्त का संचार होता है।
  • कद्दू के बीजों की गिरी प्रयोग करने से पागलों का पागलपन भी ठीक हो जाता है। कद्दू के बीज में विटामिन `एफ´ होता है।
  • कद्दू की मींगी अनिद्रा रोग को ठीक कर देती है।
  • कद्दू की मींगी का प्रयोग करने से फेफड़ों से रक्त आना बन्द हो जाता है।
  • कद्दू की मींगी दिमाग की खुश्की और गर्मी के ज्वर का नाश करती है   
  •    

                              विटामिन 'के'

    विटामिन `के´ शरीर के लिए बहुत जरूरी विटामिन होता है। शरीर में कहीं से भी होने वाले रक्तस्राव को रोकने की इसमें अदभुत क्षमता होती है। इसकी कमी से शरीर में अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं।

    विटामिन `के´ की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग-

    • खून का पतला होना।
    • खून में प्रोथेम्बिक तत्व की कमी होना।
    • रक्तस्राव होना।

    विटामिन `के´ युक्त खाद्य पदार्थ-

    नोट-

    जिन पौधों में क्लोरोफिल होता है, उसमें विटामिन `के´ अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है।

    विटामिन `के´ से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य-

    • विटामिन `के´ पानी में घुल जाता है।
    • विटामिन `के´ नीबू-संतरा, रसदार फल, हरी सब्जियां, पालक, टमाटर में अधिक पाया जाता है।
    • विटामिन `के´ रक्त के संतुलन तथा प्रवाह को अपने प्रभाव में रखता है।
    • घातक शस्त्रों की चोट से निकलने वाले रक्त को रोकने के लिए इसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया जाता है।
    • रक्तस्राव वाले रोगों में शीघ्र लाभ के लिए हमेशा विटामिन `के´ युक्त इंजेक्शन का ही प्रयोग करना चाहिए टैबलेट का नहीं।
    • विटामिन `के´ नियमित दो मिलीग्राम दिन में 3 बार खिलाने से प्रोथोम्बिन नॉर्मल हो जाता है।
    • विटामिन `के´ की कमी से शरीर का खून पतला हो जाता है।
    • नकसीर विटामिन `के´ कमी से बढ़ती है।
    • विटामिन `के´ चूना यानि कैल्शियम के संयोग से तीव्रता से क्रियाशील होता है।
    • खून का न जमना अथवा देर से जमना जाहिर करता है कि शरीर में विटामिन `के´ की अत्यधिक कमी हो चुकी है।
    • विटामिन `के´ पाचनक्रिया सुधारने के लिए सक्रिय योगदान देता है।
    • नवजात शिशु के शल्यक्रम में सर्वप्रथम विटामिन `के´ का प्रयोग करना पड़ता है।
    • नवजात शिशुओं के पीलिया रोग में विटामिन `के´ का प्रयोग करना हितकर होता है।
    • विटामिन `के´ पीले रंग के कणों में उपलब्ध होता है।
    • वयस्क रोगियों को रुग्णावस्था (रोग की अवस्था में) में विटामिन `के´ कम से कम 10 मिलीग्राम तथा अधिक से अधिक 300 मिलीग्राम प्रतिदिन की एक या अधिक मात्रा देनी चाहिए।
    • यदि विटामिन `के´ इंजेक्शन के रूप में उपलब्ध हो तो प्रतिदिन एक एम.एल ही रुग्णावस्था (रोग की अवस्था में) में देना पर्याप्त है। आवश्यकता पड़ने पर यह मात्रा दोहराई भी जा सकती है।
    • किसी भी प्रकार के अधिक स्राव में विटामिन `के´ नियमपूर्वक प्रयोग किया जा सकता है। इसके साथ यदि कैल्शियम और विटामिन सी प्रयोग किया जाए तो और भी अच्छा लाभ होता है।
    • यदि यकृत रोगग्रस्त हो चुका हो और रक्तस्राव (खून बहने) होने लगे तो विटामिन `के´ का प्रयोग करना चाहिए।
    • प्रसव से पहले विटामिन `के´ का प्रयोग करने से प्रसवकाल में रक्तस्राव कम होता हैं
    • ऑप्रेशन के पूर्व तथा ऑप्रेशन के बाद रक्तस्राव न होने देने अथवा कम होने के लिए विटामिन `के´ का प्रयोग किया जाता है।
    • शरीर में गांठे पड़ जाने पर विटामिन `के´ की आवश्यकता पड़ती है।
    • हाइपोप्रोथोम्बेनेविया रोग में विटामिन `के´ के प्रयोग से आराम मिल जाता है।
    • हेमाटेमेसिस रोग में विटामिन `के´ का प्रयोग लाभ देता है।
    • शीतपित्त तथा क्षय (टी.बी.) रोगों में विटामिन `के´ का प्रयोग लाभ प्रदान करता है।
    • रक्तप्रदर में विटामिन `के´ का प्रयोग करने से लाभ होता है।
    • खून को जमाने में विटामिन `के´ का प्रयोग सर्वोत्तम प्रभाव रखता है।
    • प्रोथोम्बिन की कमी विटामिन `के´ की वजह से होती है।
    • आंतड़ियों के घाव तथा आंतड़ियों की सूजन विटामिन `के´ की कमी से होती है। आंतड़ियों में पित्त का अवशोषण न हो पाने की वजह से भी विटामिन `के´ की शरीर में कमी हो जाती है।

                              विटामिन 'डी'

    विटामिन डी स्वस्थ हड्डियों और दांतों के लिए महत्वपूर्ण है. यह कैल्शियम को अवशोषित और कैल्शियम और फास्फोरस का स्तर बनाए रखने में मदद करता है. रवि कई खाद्य स्रोतों भी उपलब्ध हैं, लेकिन विटामिन डी के लिए सबसे अच्छा स्रोत है.

    विटामिन डी का सबसे अच्छा खाना स्रोतों में से कुछ में शामिल हैं:

    • मकई के गुच्छे की तरह नाश्ता अनाज
    • भरता
    • डेयरी उत्पादों
    • काले हरी पत्तेदार सब्जियों
    • दूध
    • दही
    • आइसक्रीम
    • ऐसे जिगर, गुर्दे के रूप में अंग मीट
    • अंडे
    • प्रकार की समुद्री मछली
    • सामन
    विटामिन `डी` की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग-

    विटामिन `डीयुक्त खाद्यों की तालिका-

    निम्नलिखित खाद्य-पदार्थो में विटामिन `डी´ पाया जाता है। जिन रोगियों के शरीर में विटामिन `डी´ की कमी होती है उनको औषधियों से चिकित्सा करने के साथ-साथ इन खाद्यों का प्रयोग भी करना चाहिए। विटामिन `डी´ प्राय: उन सभी खाद्यों में होता है जिनमें विटामिन `ए´ पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहता है।

    • ताजी साग-सब्जी।
    • पत्तागोभी
    • पालक का साग।
    • सरसों का साग।
    • हरा पुदीना।
    • हरा धनिया।
    • गाजर
    • चुकन्दर
    • शलजम
    • टमाटर।
    • नारंगी।
    • नींबू
    • मालटा।
    • मूली
    • मूली के पत्ते।
    • काड लिवर ऑयल।
    • हाली बुटलिवर ऑयल सलाद।
    • सलाद।
    • चोकर सहित गेंहूं की रोटी।
    • सूर्य का प्रकाश।
    • नारियल
    • मक्खन।
    • घी
    • दूध
    • केला
    • पपीता
    • शाकाहारी भोजन।
    • मछली का तेल।
    • शार्क लीवर ऑयल।
    • अण्डे की जर्दी।
    • बकरे की अण्डग्रंथियां।

    विटामिन `डी´ से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें-

    • विटामिन `डी´ का आविष्कार विड्स ने 1932 में किया था।
    • विटामिन `ए´ की भांति विटामिन `डी´ भी तेल और वसा में घुल जाता है पर पानी में नहीं घुलता।
    • जिन पदार्थो में विटामिन `ए´ रहता है विशेषकर उन्हीं में विटामिन `डी´ भी विद्यमान रहता है।
    • मछली के तेल में विटामिन `डी´ अधिक पाया जाता है।
    • विटामिन `डी´ की कमी हो जाने पर आंतें कैल्शियम तथा फास्फोरस को चूसकर रक्त में शामिल नहीं कर पाती हैं।
    • सूर्य के प्रकाश में विटामिन `डी´ रहता है। कुछ चिकित्सक घावों, फोड़ों तथा रसौलियों की चिकित्सा सूर्य के प्रकाश से करते हैं।
    • प्रातःकाल सूर्य के प्रकाश में लेटकर सरसों के तेल की मालिश पूरे शरीर पर की जाए तो शरीर को विटामिन `डी´ पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है।
    • सौर ऊर्जा से बने भोजन में पर्याप्त मात्रा में विटामिन `डी´ उपलब्ध होता है।
    • भोजन को थोड़ी देर तक सूर्य के प्रकाश में रख दिया जाये तो उसमें विटामिन `डी´ पर्याप्त मात्रा में आ जाता है।
    • चर्म रोगों की चिकित्सा के लिए विटामिन `डी´ अति उपयोगी है। इसलिए कई चर्म रोग सूर्य का प्रकाश दिखाने से ठीक हो जाते हैं। विटामिन डी का सूर्य से उतना ही सम्बंध है जितना शरीर का आत्मा से।
    • विटामिन `डी´ मजबूत चमकीले दांतों के लिए अति आवश्यक है।
    • विटामिन `डी´ हडि्डयों को मजबूत बनाता है।
    • विटामिन `डी´ की कमी से हडि्डयां मुलायम हो जाती हैं।
    • विटामिन `डी´ कमी से त्वचा खुश्क हो जाती है।
    • जो लोग अंधेरे स्थानों में निवास करते हैं वे विटामिन `डी´ कमी के शिकार हो जाते हैं।
    • विटामिन `डी´ की कमी से कूबड़ निकल आता है।
    • विटामिन `डी´ की कमी से पेडू और पीठ की हडि्डयां मुड़ जाती हैं या मुलायम हो जाती है।
    • ठण्डे मुल्कों के लोग विटामिन `डी´ की कमी के शिकार रहते हैं।
    • प्राचीनकाल में लोग खुले वातावरण में रहते थे इसलिए वे बहुत कम रोगों के शिकार होते थे।
    • श्वास रोगों को दूर करने के लिए विटामिन `डी´ बहुत असरकारक साबित होता है।
    • गर्भावस्था में विटामिन `डी´ की अत्यधिक आवश्यकता पड़ती है। यदि गर्भवती स्त्री को विटामिन `डी´ की कमी हो जाये तो पैदा होने वाले बच्चे के दांत कमजोर निकलते हैं और जल्दी ही उनमें कीड़ा लग जाता है।
    • विटामिन `डी´ के कारण दांतों में कीड़ा नहीं लगता।
    • शरीर में विटामिन `डी´ की कमी से हडि्डयों में सूजन आ जाती है।
    • गर्म देश होने के बाद भी भारत के लोगों में सामान्यत: कमजोर अस्थियों का रोग पाया जाता है।
    • केवल अनाज पर निर्भर रहने वाले लोग अक्सर अस्थिमृदुलता (हडि्डयों का कमजोर होना) के शिकार हो जाते हैं।
    • बच्चे की खोपड़ी की हडि्डयां तीन मास के बाद भी नर्म रहे तो समझना चाहिए कि विटामिन `डी´ की अत्यधिक कमी हो रही है।
    • विटामिन `डी´ की प्रचुर मात्रा शरीर में रहने से चेहरा भरा-भरा, चमक लिए रहता है।
    • पर्दे में रहने वाली अधिकांश स्त्रियां विटामिन `डी´ की कमी की शिकार रहती हैं।
    • जिन रोगियों को विटामिन `डी´ की कमी से अस्थिमृदुलता तथा अस्थि शोथ रहता है वे अक्सर धनुवार्त के शिकार भी हो जाते हैं।
    • भारत में विटामिन `डी´ की कमी को दूर करने के लिए बच्चे को बचपन से ही मछली का तेल पिलाना हितकारी होता है।
    • बच्चों, गर्भावस्था और दूध पिलाने की अवस्था में विटामिन `डी´ का सेवन बहुत जरूरी होता है।
    • व्यक्ति को बचपन के बाद जवानी और बुढ़ापे में भी मछली का तेल नियमित रूप से पिलाते रहना चाहिए। इससे शरीर में विटामिन `डी´ की पर्याप्त मात्रा बनी रहती है।
    • बुढ़ापे में विटामिन `डी´ की कमी हो जाने पर जोड़ों का दर्द प्रारंभ हो जाता है।
    • विटामिन `डी´ की कमी से हल्की सी दुर्घटना हो जाने पर भी हडि्डयां टूट जाती हैं।
    • विटामिन `डी´ की कमी से बच्चों की खोपड़ी बहुत बड़ी तथा चौकोर सी हो जाती है।
    • विटामिन `डी´ की कमी से बच्चों के पुट्ठे कमजोर हो जाते हैं।
    • विटामिन `डी´ की कमी से बच्चों का चेहरा पीला, निस्तेज, कान्तिहीन दृष्टिगोचर होने लगता है।
    • विटामिन `डी´ की कमी के कारण बच्चा बिना कारण रोता रहता है।
    • विटामिन `डी´ की कमी से बच्चे का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है तथा उसको कुछ भी अच्छा नहीं लगता है।
    • यदि वयस्कों के शरीर में विटामिन `डी´ की कमी हो जाये तो प्रारंभ में उनको कमर और कुल्हों की वेदना सताती है।
    • यदि वयस्कों को विटामिन-डी की अत्यधिक कमी हो जाये तो उनके पेडू और कूल्हे की हडि्डयां मुड़कर कुरूप हो जाती हैं।
    • शरीर में विटामिन `डी´ की कमी से सीढ़ियां चढ़ने पर रोगी को कष्ट होता है।
    • शीतपित्त रोग के पीछे शरीर में विटामिन `डी´ की कमी होती है अत: इस रोग की औषधियों के साथ विटामिन `डी´ का प्रयोग भी लाभ प्रदान करता है।
    • विटामिन `डी´ की कमी को दूर करने के लिए कच्चा अण्डा प्रयोग करना हितकर होता है।
    • सर्दियों तथा बरसात के मौसम में बच्चों, बूढ़ों तथा जवानों को समान रूप से विटामिन `डी´ की अधिक आवश्यकता रहती है।
    • विटामिन `डी´ की अधिकता से दिमाग की नसें शक्तिशाली और लचीली हो जाती हैं।
    • विटामिन `डी´ सब्जियों में नहीं पाया जाता है।
    • अण्डा, मक्खन, दूध, कलेजी में विटामिन `डी´ ज्यादा मात्रा में रहता है।
    • ग्रामीण लोगों को सूर्य की किरणों से पर्याप्त विटामिन `डी´ मिल जाता है।
    • ग्रामीण लोगों की अपेक्षा शहरी लोग अधिक विटामिन `डी´ की कमी के शिकार होते हैं।
    • पुरुषों को प्रतिदिन 400 से 600 यूनिट विटामिन `डी´ की आवश्यकता होती है। दूध पीते बच्चों को भी इतनी ही आवश्यकता होती है।
    • अस्थिशोथ (रिकेट्स) तथा निर्बलता में 4 से 20 हजार अंतर्राष्ट्रीय यूनिट विटामिन `डी´ की आवश्यकता होती है।

    कैल्शियमयुक्त खाद्य (प्रति 100 ग्राम)

                                 विटामिन 'पी'

    विटामिन `पी´ की खोज तो हो चुकी है लेकिन अभी इसको चिकित्सा हेतु प्रयोग नहीं किया जा रहा है आशा की जाती है कि जल्दी ही यह विटामिन भी अन्य विटामिनों की भांति प्रचलन में आ जायेगा। लेकिन हमारे देश में अभी इसके इतनी जल्दी प्रचलन में आने की आशा नहीं है। विटामिन `एफ´ की भांति विटामिन `पी´ भी नींबू और संतरे में काफी पर्याप्त मात्रा में रहता है। इसका कार्य भी विटामिन-सी की ही भांति है। यह रक्तस्राव को रोकता है। इसके प्रचलन में आते ही रक्तस्राव सम्बंधी अनेक रोगों पर काबू पाया जा सकेगा। चिकित्सा विज्ञानियों ने विटामिन `एम´ का भी अविष्कार कर लिया है, लेकिन अभी यह भी विटामिन `पी´ की भांति ही प्रचलन में नहीं है।

                      विटामिन 'बी' कंपलेक्स

    परिचय-

    विटामिन बी-काम्पलेक्स शरीर को जीवनी शक्ति देने के लिए अति आवश्यक होता है। इस विटामिन की कमी से शरीर अनेक रोगों का गढ़ बन जाता है। विटामिन-बी के कई विभागों की खोज की जा चुकी है। ये सभी विभाग मिलकर ही विटामिन बी-काम्पलेक्स कहलाते हैं। हालांकि सभी विभाग एक दूसरे के अभिन्न अंग हैं, लेकिन फिर भी सभी आपस में भिन्नता रखते हैं। विटामिन बी-काम्पलेक्स 120 सेंटीग्रेड तक की गर्मी सहन करने की क्षमता रखता है। उससे अधिक ताप यह सहन नहीं कर पाता और नष्ट हो जाता है। यह विटामिन पानी में घुलनशील है। इसका प्रमुख कार्य स्नायु को स्वस्थ रखना तथा भोजन के पाचन में सक्रिय योगदान देना होता है। भूख को बढ़ाकर यह शरीर को जीवनी शक्ति देता है। ये खाए-पिए हुए पदार्थों को अंग लगाने में सहायता प्रदान करता है। क्षार पदार्थों के संयोग से यह बिना किसी ताप के नष्ट हो जाता है, पर अम्ल के साथ उबाले जाने पर भी नष्ट नहीं होता।

    विटामिन-`बी´ काम्पलेक्स की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग-

    • हाथ पैरों की उंगलियों में सनसनाहट होना।
    • मस्तिष्क की स्नायु में सूजन व दोष होना।
    • पैर ठण्डे व गीले होना।
    • सिर के पिछले भाग में स्नायु दोष हो जाना ।
    • मांसपेशियों का कमजोर होना ।
    • हाथ-पैरों के जोड़ अकड़ना।
    • शरीर का वजन घट जाना।
    • नींद कम आना।
    • मूत्राशय मसाने में दोष आना ।
    • महामारी की खराबी होना ।
    • शरीर पर लाल-चकत्ते निकलना।
    • दिल कमजोर होना ।
    • शरीर में सूजन आना ।
    • सिर चकराना ।
    • नजर कम हो जाना।
    • पाचन क्रिया की खराबी होना ।

    विटामिन बी-काम्पलेक्स के स्रोत खाद्य पदार्थ-

    विटामिन बी-काम्पलेक्स के प्रमुख विभाग

    1.

    विटामिन बी1

    थाईमिन हाइड्राक्लोराइट

    (नोट-इसे एन्यूरिन तथा बेरी-बेरी विटामिन भी कहा जाता है।)

    2

    विटामिन बी2

    रिबोफ्लेबिन अथवा लैक्टोफ्लेबिन

    इसको विटामिन `जी´ भी कहा जाता है।

    3

    विटामिन बी3

    पैन्टोथेनिक एसिड

    4

    विटामिन बी4

    एमाइनो एसिड

    5

    विटामिन बी6

    पायरीडॉक्सीन

    6

    विटामिन बी7

    -

    7

    विटामिन बी12

    -

    8

    फोलिक एसिड

    -

    9

    यीस्ट

    खमीर

    10

    निकोटनिक एसिड

    -

    11

    नियासिन

    -

    12

    निकोटिनामाइड

    -

    13

    पैरा-एमीनो बेन्जोइएक एसिड

    -

    14

    विटामिन `ए´

    बायोटिन

    15

    एडेनिल्कि एसिड

    -

    16

    कोलीन

    -

          विटामिन बी1 की कमी से होने वाले रोग-

    विटामिन बी1 का महत्वपूर्ण तथ्य-

    • विटामिन बी1 का वैज्ञानिक नाम थायमिन हाइड्रोक्लोराइड है।
    • वयस्कों को प्रतिदिन विटामिन बी1 की एक मिलीग्राम मात्रा आवश्यक होती है।
    • गर्भवती स्त्रियों को अपने पूरे गर्भावस्था के समय तक विटामिन बी1 की 5 मिलीग्राम मात्रा आवश्यक होती है।
    • शरीर में विटामिन बी1 जरूरत से ज्यादा हो जाने पर पेशाब के साथ बाहर निकल जाता है।
    • व्यक्ति की आयु बढ़ाने में लिए विटामिन बी1 का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
    • विटामिन बी1 की कमी से बेरी-बेरी रोग हो जाता है। इसलिए वैज्ञानिक इसे बेरी-बेरी विटामिन भी कहते हैं।
    • यदि भोजन में विटामिन बी1 की कमी हो जाए तो शरीर कार्बोहाइड्रेटस तथा फास्फोरस का सम्पूर्ण प्रयोग कर पाने में समर्थ नहीं हो पाता। इससे शरीर में एक विषैला एसिड जमा होकर रक्त में मिल जाता है और मस्तिष्क के तंत्रिका संस्थान को हानि पहुंचाने लगता है।
    • विटामिन बी1 की कमी से होने वाले बेरी-बेरी रोग में रोगी की मांसपेशियों को जहां भी छुआ जाए वहां वेदना होती है तथा उसके पश्चात स्पर्श शून्यता का आभास होता है।
    • वयस्क व्यक्ति को प्रतिदिन विटामिन बी1 900 यूनिट अ. ई. की आवश्यकता पड़ती है।
    • विटामिन बी1 मूलांकुरों में अधिक पाया जाता है।
    • दूध पीने वाले बच्चों को शरीर में विटामिन बी1 की कमी से उल्टी और पेट दर्द जैसे विकार हो जाते हैं।
    • विटामिन बी1 निशास्ता (wheat starch) युक्त भोजन को पचाने में सहयोग करता है।
    • विटामिन बी1 की कमी हो जाने से रोगी की भूख मर जाती है तथा वजन तेजी से गिरने लगता है।
    • विटामिन बी1 की कमी से हृदय और मस्तिष्क में कमजोरी तथा दूसरे दोष हो जाते हैं।
    • कार्बोहाइड्रेट तथा फॉस्फोरस का शरीर में पूर्ण उपयोग तभी हो सकता है जब शरीर में पर्याप्त मात्रा में विटामिन बी1 मौजूद हो।
    • विटामिन-बी1 की कमी से बेरी-बेरी रोग का रोगी इतना शक्तिहीन हो चुका होता है कि वह जहां एक बार बैठ जाता है दुबारा उठने का साहस अपने अन्दर नहीं संजो पाता है।
    • सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा कठोर परिश्रम करने वाले लोगों को विटामिन बी1 की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।
    • विटामिन बी1 की कमी से रोगी थोड़ा सा काम करके थक जाता है।
    • विटामिन बी1 का रोगी अक्सर अजीर्ण रोग से पीड़ित रहता है।
    • बेरी-बेरी रोग विशेषरूप से उन लोगों को होता है जो मशीन से पिसा हुआ आटा और चावल ज्यादा मात्रा में खाते हैं।
    • बेरी-बेरी रोग दो प्रकार के होते है पहला शुष्क तथा दूसरा आर्द्र।
    • आर्द्र बेरी-बेरी रोग के रोगियों की नाड़ी तीव्र गति से चलती है तथा उनका हृदय कमजोर हो जाता है।
    • शुष्क बेरी-बेरी का रोगी दिन प्रतिदिन कमजोर, असहाय, दुर्बल और असमर्थ होता चला जाता है।
    • कभी-कभी, किसी-किसी रोगी में शुष्क और आर्द्र दोनों प्रकार के बेरी-बेरी के लक्षण मिलते हैं।
    • शुष्क एवं आर्द्र लक्षणयुक्त रोगी को हृदय सम्बंधी अनेक विकार होते हैं। उनका हृदय जांच करने पर फुटबाल के ब्लैडर जैसा फैला हुआ अनुभव होता है।
    • शुष्क एवं आर्द्र बेरी-बेरी के लक्षण यदि किसी रोगी में एक साथ दिखे तो उसकी चिकित्सा जितनी जल्दी हो सके आरम्भ कर देनी चाहिए। लापरवाही और गैर जिम्मेदारी जान का खतरा पैदा कर सकती है।
    • विटामिन बी1 की कमी से वात संस्थान पर असर पड़ता है और इसीलिए वात नाड़ियों में वेदना होती है।
    • गर्भावस्था की वमन (उल्टी) विटामिन बी1 की कमी का सूचक कहा जा सकता है।
    • गर्भावस्था की विषममयता विटामिन बी1 की कमी से होती है अत: विटामिन बी1 की पूर्ति हो जाने पर गर्भावस्था की विषमयता नष्ट हो जाती है।
    • बहुत से चर्म रोग विटामिन बी1 की कमी की वजह से भोगने पड़ते हैं।
    • विटामिन बी1 की कमी का प्रथम लक्षण बिना किसी कारण के भूख लगना बन्द हो जाना है।
    • वनस्पतियों, पत्तेदार शाक तथा खमीर में विटामिन बी1 अधिक मात्रा में विद्यमान रहता है।
    • पीलिया रोग के पीछे भी विटामिन बी1 की कमी होती है।
    • विटामिन बी1 की कमी से रोगी को पानी की तरह पतली उल्टी तथा जी मिचलाना जैसे रोग हो जाते हैं।
    • मोटे व्यक्तियों को विटामिन बी1 की अधिक आवश्यकता होती है।
    • विटामिन बी1 की कमी से हृदय बड़ा हो जाना रोगी के लिए बहुत ही खतरनाक साबित हो सकता है।
    • सूखे किण्व (खमीर) में विटामिन बी1 सबसे अधिक 9000 अ. ई. यूनिट होता है।
    • मटर में विटामिन बी1 सबसे कम 100 यूनिट अ.ई. होता है।
    • विटामिन बी1 की कमी से फेफड़ों की झिल्ली में तरल पदार्थ जमा हो जाता है। इसकी कमी से अण्डकोषों में भी तरल पदार्थ जमा हो जाता है।
    • आंतड़ियों की मांसपेशियों को शक्तिशाली बनाने में इस विटामिन का विशेष योगदान रहता है।
    • विटामिन बी1 की पर्याप्त मात्रा शरीर में रहने पर मांसपेशियां पुष्ट रहती हैं।
    • विटामिन बी1 की पर्याप्त मात्रा से आंतों के संक्रमण की सुरक्षा बनी रहती है। इससे आंतों की झिल्ली मजबूत बनी रहती है। इसी मजबूती के कारण इस पर कीटाणु हमला नहीं कर पाते हैं।
    • यह विटामिन यकृत की कार्य प्रणाली को स्वस्थ रखता है।
    • यदि पाचन संस्थान स्वस्थ और शक्तिशाली है तो समझना चाहिए कि शरीर में विटामिन बी1 की पर्याप्त मात्रा मौजूद है।
    • जो लोग हरी साग-सब्जी नहीं खाते वे निश्चय ही विटामिन बी1 की कमी के शिकार हो जाते हैं।
    • मस्तिष्क तथा तंत्रिका संस्थान के सूत्रों को स्वस्थ रखना इसी विटामिन के जिम्मे होते हैं।
    • यह विटामिन मानव रक्त के तरल भाग में प्रोटीन को यथाचित मात्रा में संतुलित रखता है।

    विटामिन बी1 युक्त खाद्य

    (मात्रा प्रति 100 ग्राम)

    क्र.स.

    खाद्य पदार्थों के नाम

    यूनिट में मात्रा

    1.

    सूखे किण्व

    9000 यूनिट

    2.

    ताजे किण्व

    6000 यूनिट

    3.

    गेहूं के अंकुरों में

    4000 यूनिट

    4.

    गेहूं के दानों में

    900 यूनिट

    5.

    गेंहूं की रोटी में

    360

    6.

    मटर

    100

    7.

    हरी सब्जियां

    30 से 210 यूनिट

    8.

    आलू

    90 से 120 यूनिट

    9.

    दूध

    60 यूनिट

    10.

    अण्डे की जर्दी

    400 यूनिट

    11.

    जिगर

    450 यूनिट

    12.

    गुर्दे

    470 यूनिट


       विटामिन बी2 की कमी से उत्पन्न रोग-
    • होंठों के किनारे फट जाना।
    • जीभ का रंग लाल होना, छाले निकलना, जीभ का सूज जाना
    • नाक का पकना व सूजना।
    • आंख में जलन व सूजन, धुंधलापन होना।
    • कान के पीछे खुजली होना
    • योनि की खुजली।

    विटामिन बी2 के जानने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य-

    • विटामिन बी2 को विटामिन `जी´ भी कहा जाता है।
    • विटामिन बी2 यीस्ट लीवर एक्स्ट्रैक्ट, गेहूं के अंकुर, दूध आदि में पाया जाता है।
    • शरीर में विटामिन बी2 की कमी हो जाने पर शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के लिए यह विटामिन एक से तीन मिलीग्राम तक पर्याप्त होता है।
    • इस विटामिन को रिबोफ्लेबिन कहा जाता है।
    • विटामिन बी2 पीले रंग का होता है।
    • विटामिन बी2 पानी में कम घुलता है।
    • विटामिन बी2 सोडा बाई कार्ब के संपर्क में आकर नष्ट हो जाता है।
    • इस विटामिन को वैज्ञानिक भाषा में लैक्टोफ्लेबिन भी कहा जाता है। किये गये परीक्षणों से ज्ञात हुआ है कि शरीर में विटामिन बी1 और विटामिन बी2 की कमी एक साथ होती है।
    • ध्यान रहे विटामिन बी-काम्पलेक्स में प्रत्येक तत्व की एक साथ कमी हो जाती है।
    • विटामिन बी2 की कमी से आंखें चुंधिया जाने का रोग हो जाता है।
    • विटामिन बी2 की कमी की सबसे प्रमुख पहचान मुंह के कोनों पर पीलापन छा जाना होता है।
    • विटामिन बी2 की कमी से नाक में सूजन आ जाती है।
    • विटामिन बी2 की कमी से आंखों की रोशनी में धुंधलापन आने लगता है।
    • विटामिन बी2 की कमी से आंखों में सूजन आ जाती है।
    • एक रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन विटामिन बी2 की मात्रा 50 मिलीग्राम दी जानी चाहिए।
    • चेहरे के कील-मुंहासों का एक कारण शरीर में विटामिन बी2 की कमी हो जाना होता है।
    • जीभ तथा होठों के रोग विटामिन बी2 की कमी से होते हैं।
    • दूरस्थ तंत्रिकाओं के विकार विटामिन बी2 की कमी से होते हैं।
    • आवश्यकता से अधिक विटामिन हो जाने पर विटामिन बी2 पेशाब के साथ बाहर निकल जाता है।
    • शरीर में विटामिन बी2 की कमी से महिलाओं को योनि की खुजली हो जाती है।
    • मुखपाक (मुंह के छाले) विटामिन बी2 की कमी से होता है।
    • विटामिन बी2 की कमी से आंखों के अनेक रोग शरीर को घेर लेते हैं। जिसमें आंखों का रूखापन, आंखों की सूजन तथा रोहें प्रमुख हैं।
    • विटामिन बी2 की कमी से आंसू निकलने लगते हैं।
    • दूध, मछली तथा खमीर से विटामिन बी2 प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है।
    • विटामिन बी2 की कमी से पलकों में जलन और खाज होने लगती है।
    • कार्निया की सूजन विटामिन बी2 की कमी से होती है।
    • होंठ फटने का मुख्य कारण शरीर में विटामिन बी2 की कमी होता है।

    विटामिन बी2 के स्रोत वाले खाद्य पदार्थो की तालिका-

    • टमाटर
    • पालक
    • बन्दगोभी
    • दूध
    • यीस्ट
    • लीवर
    • आसव अरिष्ट
    • मछली
    • खमीर
    • अण्डे की सफेदी
    • चावल की भूसी
    • माल्टा
    • गाजर
    • फलियां

    नोट-

    एक स्वस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन विटामिन बी2 की 3 मिलीग्राम तक की मात्रा की आवश्यकता होती है। लेकिन एक रोगी को 50 मिलीग्राम प्रतिदिन विटामिन बी2 की आवश्यकता रहती है।

              विटामिन बी4 के महत्वपूर्ण तथ्य-
    • विटामिन बी4 को एमाइनो एसिड भी कहा जाता है।
    • इसकी रासायनिक रचना प्रोटीन जैसी होती है।
    • शरीर में जब प्रोटीन पच जाता है तब आंतों में जो शेष बचा हुआ पदार्थ रहता है उसे ही एमाइनो एसिड नाम से पुकारा जाता है और यही विटामिन बी4 होता है।
    • आंतें एमाइनो एसिड अर्थात् विटामिन बी4 का प्रचूषण करती हैं।
    • आंतें एमाइनो एसिड को चूसकर यकृत में भेज देती है। एमाइनो एसिड अनेक प्रकार के होते हैं।
    • विटामिन बी4 शरीर के विभिन्न अवयवों का निर्माण करता है।
    • विटामिन बी4 घावों को भरने में मदद करता है।
    • विटामिन बी4 का संचय यकृत और पेशियों में होता है।
    • ज्वर होने का एक कारण शरीर में विटामिन बी4 की कमी भी होता है।
    विटामिन बी6 की कमी से उत्पन्न रोग-

    विटामिन बी6 के स्रोत वाले खाद्य पदार्थों की तालिका-

    विटामिन बी6 की महत्वपूर्ण बातें-

    • विटामिन बी6 को पायरीडॉक्सिन के नाम से भी जाना जाता हैं।
    • विटामिन बी6 का रंग सफेद होता है।
    • यह गंधरहित क्रिस्टल अर्थात् कणों वाला पाउडर होता है।
    • विटामिन बी6 की कमी से रोगी को त्वचा के रोग हो जाते है जिनमें त्वचा की सूजन प्रमुख होती है।
    • विटामिन बी6 का प्रयोग अधिकतर मुहांसों को दूर करने के लिए किया जाता है।
    • बच्चों को आक्षेप या कम्हेड़े के दौरे पड़ने पर इसका प्रयोग अच्छा लाभ देता है।
    • विटामिन बी6 की कमी से पेट के कई रोग हो जाते हैं जिनमें प्रमुख रूप से पेट में दर्द और ऐंठन होती है।
    • क्लोरोफार्म के प्रयोग से होने वाले विकारों में विटामिन बी6 लाभ प्रदान करता है। ईथर प्रयोग करने पर उससे होने वाले विकारों को दूर करने के लिए विटामिन बी6 का प्रयोग हितकारी साबित होता है।
    • विटामिन बी6 प्रकाश के संपर्क में आकर नष्ट हो जाता है।
    • विटामिन बी6 पर क्षार का प्रभाव नहीं पड़ता है।
    • विटामिन बी6 खून में सफेद कणों के निर्माण में अहम भूमिका अदा करता है।
    • विटामिन बी6 गर्मी के प्रभाव से नष्ट नहीं होता।
    • गर्भावस्था के विकारों को शान्त रखने के लिए इस विटामिन की काफी अधिक आवश्यकता पड़ती है।
    • विटामिन बी6 की कमी से होठों के कोनों में जख्म उत्पन्न हो जाते है।
    • अनिद्रा रोग शरीर में विटामिन बी6 की कमी की वजह से होता है।
    • कील-मुहांसों को दूर करने के लिए विटामिन बी6 रामबाण साबित होता है।
    • डब्बे का दूध पीने वाले बच्चे इस विटामिन की कमी से चिड़चिड़े हो जाते हैं और रात-दिन रोते रहते हैं।
    • विटामिन बी6 की कमी से रोगी को पक्षाघात जैसे भयंकर रोग हो सकते हैं।
    • विटामिन बी6 की कमी से पीलिया रोगों का सामना करना पड़ता है।
    • पशुओं की कलेजी में विटामिन बी6 प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।
    • विटामिन बी6 की कमी से पेलाग्रा रोग हो जाता है।

    विटामिन बी7 के महत्वपूर्ण तथ्य-
    • यह विटामिन प्रोटीन के पाचन में सहयोग की भूमिका अदा करता है।
    • इसकी कमी शरीर में हो जाने से पेलाग्रा रोग उत्पन्न हो जाता है।
    • इसकी कमी से रोगी अनिद्रा का शिकार हो जाता है।
    • यह कार्बोहाइड्रेटस के पाचन में सहयोगी होता है।
    • इस विटामिन की कमी से रोगी मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाता है।
    • त्वचा पर खुश्की के लक्षण विटामिन बी7 की कमी से उत्पन्न होते हैं।
    • रोग की अवस्था में विटामिन बी7 की 50 मिलीग्राम से लेकर 104 मिलीग्राम तक प्रयोग किया जाता है।
    • विटामिन बी7 की अधिकता अथवा अधिक प्रयोग करने से त्वचा लाल हो जाती है तथा लाली वाले स्थान पर चुनचुनाहट प्रतीत होने लगती है।
    • विटामिन बी7 की कमी से पागलपन के दौरे पड़ने लगते हैं।
    • शरीर में खून की कमी विटामिन बी7 की कमी के परिणामस्वरूप होती है।
    • मुंह के कोणों के जख्म विटामिन बी7 की कमी से होते हैं।
    • विटामिन बी7 की कमी से शारीरिक, मानसिक दुर्बलता पैदा हो जाती है।
    • पतले दस्तों का एक कारण विटामिन बी7 की शरीर में कमी हो जाना माना जाता है।
    • विटामिन बी7 की कमी यदि दूर कर दी जाये तो शरीर में इसकी कमी से होने वाले रोग दूर हो जाते हैं।
    • विटामिन बी7 विटामिन बी-कॉम्पलेक्स का सातवां महत्वपूर्ण अंश है। जिसकी कमी से शरीर में अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं।

    विटामिन बी12 की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग

    • शारीरिक कमजोरी।
    • मानसिक कमजोरी।
    • खून की कमी
    • जीभ में सूजन और लाली।
    • भूख कम लगना।

    विटामिन बी12 के स्रोत वाले खाद्य पदार्थो की तालिका-

    • पशुओं के जिगर का सत्व।
    • मछली।
    • मांस।
    • अण्डा।
    • दूध

    विटामिन के बारे में आम गलतफहमी

    विटामिन के बारे में आम गलतफहमी उनके उपचारात्मक प्रभाव के अलावा, मौजूद हैं. वे ड्रग्स नहीं कर रहे हैं और किसी भी हालत या विकार का इलाज करने में विफल. आपूर्ति करता है तनाव का मुकाबला करने और आम सर्दी के रूप में छोटे जटिलताओं के इलाज के लिए एक विकल्प के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं. विटामिन कार्बनिक यौगिक हैं और सहएंजाइमों के रूप में, शरीर की चयापचय की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. विटामिन उनके मूल स्रोत, भोजन से सिफारिश की है.

    विटामिन बीमारियों के किसी भी प्रकार पर कोई जादुई प्रभाव के अधिकारी असफल.

    विटामिन जैसे विटामिन ए, डी, ई और विटामिन बी और सी के लालकृष्ण वृद्धि हुई सेवन के रूप में वसा में घुलनशील विटामिन, के मामले में, के माध्यम से उनके उन्मूलन में परिणाम, जिससे विषाक्तता के कारण, संचय में अतिरिक्त परिणाम के रूप में, अनुशंसित स्तरों में सलाह दी जाती है मूत्र, वे पानी में घुलनशील हैं.

    अत्यधिक आपूर्ति करता है, शरीर को प्रभावित करता है. Pyridoxine कारण तंत्रिका अध: पतन की बड़ी खुराक. पानी में घुलनशील विटामिन उनके घुलनशीलता के कारण, समय की एक बहुत ही कम समय के लिए जमा हो जाती है, जबकि वसा में घुलनशील विटामिन, वसा ऊतकों और जिगर में संग्रहित किया जा सकता है.

    कमी के मामले में लक्षण का चित्रण, एक लंबा समय लगता है. सभी बड़े और छोटे पोषक तत्वों के साथ खाद्य पदार्थों की एक किस्म की कमी को रोकने में मदद करते हैं. आपूर्ति करता है विशेष मामलों में आवश्यक हैं.

    पशु आहार से वंचित शाकाहारियों cobalamine की कमी का सामना. न्यूरल ट्यूब दोष फोलेट की कमी के साथ माताओं के शिशुओं में आम है. फोलेट की 400 मिलीग्राम गर्भावस्था के दौरान की सिफारिश की है.

    कम वसा वाले आहार में वसा उनके घुलनशीलता के लिए आवश्यक है, के रूप में वसा में घुलनशील विटामिन की कमी में परिणाम. धूम्रपान करने वालों धूम्रपान न करने वालों की तुलना में, एस्कॉर्बिक एसिड की मात्रा दोगुनी की आवश्यकता होती है. स्वास्थ्य लाभ विटामिन की वृद्धि की जरूरतों के लिए कहता है. वजन घटाने के कार्यक्रमों पर मोटे लोगों को अग्नाशयशोथ, दस्त और सीलिएक रोग से पीड़ित लोगों के लिए, इसके अलावा, की खुराक की आवश्यकता होती है. सर्जिकल प्रक्रियाओं की खुराक के साथ पीछा किया जाना है.

    गलतफहमी गुर्दे की पथरी, दस्त, उल्टी, पेट में ऐंठन, थकान और सिर दर्द में विटामिन सी के परिणाम की विटामिन सी अत्यधिक सेवन लेने के द्वारा, जुकाम संक्रमण की रोकथाम के बारे में मौजूद हैं. विटामिन का सेवन अवसाद या तनाव पर कोई असर विफल रहता है. विटामिन ई विरोधी बुढ़ापे क्रीम और एक युवा देखो बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. रिसर्च इन दोनों के बीच सहसंबंध के अभाव का पता चलता है. अत्यधिक विटामिन ए कैंसर का इलाज करने के लिए और जीवन के लिए खतरा हो सकता है विफल रहता है. बीटा कैरोटीन के दीर्घकालिक पूरकता कैंसर की घटनाओं से पता चलता है. किसी भी इलाज के लिए जिम्मेदार परम संघटक, अलग अनुकूल नहीं है. आंत्र जंतु बीटा कैरोटीन की खुराक के साथ पूरक विषयों में अधिक कर रहे हैं. लंबे समय तक पूरकता जीवन के लिए खतरा है.

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